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बर्बर कृत्य के लिये फांसी,

रायपुर दिनांक 11 अक्टूबर 2010

बर्बर कृत्य के लिये फांसी, नाबालिगो
से बहशीपन पर भी हो मौत की सजा!
>>बहुओं को जलाया जाना बर्बर और जंगली जानवरों जैसा कृत्य हैं। जब तक इस तरह के अपराध को अंजाम देेेने वालों को फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया जायेगा। तब तक लोग महसूस नहीं करेंगे कि बहुओं को जलाया जाना अपराध है। <<सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू और न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की खण्डपीठ ने पंजाब के फिरोजपुर की निचली अदालत द्वारा बहू की हत्या मामले में दोषी ठहराये गये एक फैसले में यह टिप्पणी की। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए उक्त व्यक्ति के आजन्म कारावास सजा बरकरार रखी है। न्यायमूर्ति काटजू ने यहां तक कहा कि हमारे बहुत से न्यायधीश अंहिसांवादी हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं। मिलापकुमार ने अपनी पत्नी राजबाला को इसलिये जलाकर मार डाला था। चूंकि उसने उसके साथ खेत पर काम करने से मना कर दिया। देश में ऐसी सैकड़ों घटनाओं के परिपे्रक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने देशभर के न्यायालयों में पड़े इस ढंग के अनेक मामलों में पीडि़त पक्ष को न्याय की आस दिलाई है। इसके साथ ही हम यह भी कहना चाहते हैं कि सरकार व सर्वोच्च न्यायालय को देश मे नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले अत्याचार को रोकने के लिये भी सख्त होना चाहिये। यंू तो देश में नाबालिगों को जिंदगी भर के लिये कहीं का न रहने देने की कई घटनाएं होती हैं, किंतु हम अकेले छत्तीसगढ़ की बात लें तो ऐसी घटनाएं माह में कम से कम एक दर्जन से ज्यादा घटनाएं नाबालिग बच्चियों को फुसलाकर या उनसे बलात कुकृत्य करने की होती हैं। जिसमें आधे से भी कम मामलेे ऐसे हैं, जिसमें लोग पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। क्योंकि लोग पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराकर कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहते या फिर मानमर्यादा अथवा सामने वाले की दबगंता अथवा प्रभाव के आगे बेबस हो जाते हैं। हाल ही छत्तीसगढ़ की राजधानी से एक नाबालिग छात्रा का उस समय दो लड़कों ने अपहरण कर लिया। जब वह शाम के समय सामान खरीदने निकली थी। उसे आरंग ले जाकर उन लड़कों ने तो रेप किया ही, साथ ही अपने दोस्तों से भी रेप कराया। मरणासन्न स्थिति में लड़की को छोड़कर ये भाग गये। ऐसे कितने ही मामले रोज आते हैं और गरीब परिवार न्याय के लिये तरस जाता है। एक मामला प्रेमनगर सरगुजा का भी है- जहां एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। ऐसे कृत्यों में लिप्त लोगों के प्रति पुलिस को तो सख्त होने की जरूरत ह।ै साथ ही ऐसे तत्वों के प्रति भी अदालतों का रवैया भी कथित बहू हत्या जैसे मामले की तरह सख्त होना चाहिये। जब तक अपराधियों को कठोर से कठोर सजा नहीं मिलेगी, ऐसे दरिन्दे समाज में घूमते रहेंगे और किसी अबला का रोज चीरहरण होता रहेगा। पुलिस व समाज दोनों की जिम्मेदारी इस मामले में बनती है। इस ढंग की वारदातों में लिप्त लोगों के पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर उनके साथ रोटी-बेटी का संबन्ध न रखा जाये। समाज में व्याप्त इस गंभीर बीमारी का इलाज देश की व्यवस्थापिका, कार्यपालिका या न्यायपालिका से ज्यादा समाज के हाथ में हैं।

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

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