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नक्सली अब अपनी आइडेंटिटी प्रदर्शन के साथ शहरों की ओर!

रायपुर रविवार दिनांक 10 अक्टूबर 2010
नक्सली अब अपनी आइडेंटिटी
प्रदर्शन के साथ शहरों की ओर!
अबूझमाड़ के जंगलों से निकलकर नक्सलियों ने शहरी क्षेत्र की ओर मार्च कर दिया है। शहरी क्षेत्र में नक्सलियों की बेखौफ मौजूदगी और ग्राीमणों के साथ मेलजोल,बातचीत और उनके बीच बैठकर खाना खाने से यह बात स्पष्ट हो गई है, कि नक्सलियों का पुलिस की गोली से खौफ खत्म हो गया है और वे किसी भी मुकाबले के लिये तैयार हैँ। आपको याद होगा जब नक्सल विरोधी अभियान के लिये राज्य सरकार ने पंजाब के पूर्व डायरेक्टर जनरल जी एस गिल की नियुक्ति की थी। तब नक्सलियों ने बस्तर क्षेत्र को धमाकों से उनके स्वागत में गुंजा दिया था अर्थात नक्सली एक तरह से पुलिस के नई नियुक्ति की खिल्ली उड़ा रहे थे। गिल के चार्ज लेने के बाद प्रदेश में नक्सलियों का अभियान तेज हो गया और एक के बाद एक चुनौतीपूर्ण घटनाएं हुई। गिल ने बाद में इस अभियान से अपने आपको अलग कर राज्य सरकार पर इस अभियान में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाते हुए छत्तीसगढ़ से विदा हो गये। यह भी महत्वपूर्ण है कि जब भी राज्य या केन्द्र में कोई पुलिस अधिकारी या नेता नक्सलियों से जोरदार तरीके से निपटने की बात करता है। तो इसका जवाब नक्सलियों की तरफ से हिंसा या तोडफ़ोड़ से ही होती है। मानो वे चुनौती दे रहे हो आजा निपट ले। अब केन्द्र ने चंदन तस्कर वीरप्पन को मारने में अहम भूमिका निभाने वाले सीआरपीएफ के डीजी विजय कु मार को इस अभियान में लगाया है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिहं से उनकी औपचारिक मुलाकात में उन्होंने उन्हें नक्सलियों से निपटने की शुभकामना दी है। साथ ही यह भी कहा है कि यहां आपका मुकाबला एक वीरप्पन से नहीं कई वीरप्पनों से हैं। मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी शायद विजय कुमार को यह बताने की है कि वे जितना आसान इस टास्क को समझ रहे हैं। वह उतना आसान नहीं हैं। विजय कुूमार एक तेज तर्रार अफसर हंै। वे नक्सलियों से निपटने अच्छी ब्यूह रचना भी तैयार कर लें लेकिन इस अफसर को भी संपूर्ण स्थिति को समझने के लिये पहले छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति को समझना होगा। यह सही है कि कर्नाटक, आंन्ध्र, केरल और तामिलनाडू के जंगल में धूम मचाने वाले वीरप्पन को भारी फोर्स के जरिये जगंलों से बाहर निकालकर घेरकर मार दिया गया। लेकिन यहां आज की स्थिति में नक्सली जंगल से निकलकर आम रास्ते पर पक्की सड़कों पर हैं और ग्रामीणों से खुले आम मुलाकात कर रहे हैं। परिस्थितियां एकदम अलग हैं। दो- तीन सौ की संख्या में नक्सली पूरे लाव लश्कर के साथ निकलते हैं और पुलिस को चारों और से घेर रहे हैं। शनिवार को जो खबर आई उसके अनुसार पुलिस और नक्सलियों के बीच एक तरफ जहां राजनांदगांव के जगंली इलाकों में मुठभेड़ चल रही थी, तो दूसरी तरफ महासमुन्द में उड़ीसा सीमा पर पुलिस और नक्सलियों के बीच लगातार गोलियों का आदान प्रदान हो रहा था। नक्सलियों की यह चुुनौती जरूर नये डीआईजी के लिये है, लेकिन पहले चरण में करीब आठ से ज्यादा नक्सलियों के मारे जाने से उन्हें यह चुनौती महंगी पड़ी है। नक्सलियों के जंगलों से बाहर निकलकर शहर की और बढऩे का कदम उनकी कौन सी रणनीति है, यह तो पता नहीं लेकिन यह पहली बार है जब नक्सली अपनी आईडेंङ्क्षटटी दिखाकर सरकार व पुलिस दोनों को धमका रहे हैं। विजय कुुमार इनसे निपटने कौनसी रणनीति बनाते हैं, यह आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन यह सही है कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ का एक बहुत बड़ा भाग इस समय नक्सलियों के नियंत्रण में हैं।

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