शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

जो जीता वही सिकदंर!

रायपुर दिनांक 2 अक्टूबर

जो जीता वही सिकंदर!
चार पुलिस कर्मियों को नक्सलियों ने कम से कम बारह दिन तक अपने कब्ज़े में रखने के बाद रिहा तो कर दिया किंतु इस रिहाई ने कई प्रश्न खड़े कर दिये। झारखंड व छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की कार्रवाई लगभग एक जैसी थी। वहां अपहरण कर बंधक बना ये गये एक पुलिस कर्मी को नक्सलियों ने सरकार द्वारा मांग पूरी नहीं करने के कारण मार दिया तथा बाकी को छोड़ दिया। जबकि छत्तीसगढ़ में बंधक बना ये गये सभी चारों बंधकों को रिहा कर दिया। बंधक बनाये गये जवानों में अपने घर लौटने पर जहां खुशी थी वहीं नक्सलियों का खौंफ भी था। नक्सलियों के चंगुल से मुक्त होने के बाद पुलिस कर्मियों ने नक्सलियों द्वारा किसी प्रकार के दुर्व्यवहार की शिकायत नहीं की। जबकि उनकी इन बातों से ख़ौफ़ झलकता है कि वे परिवार के दबाव में आकर अब नौकरी छोड़ भी सकते हैं। शायद यह नक्सलियों की रणनीति का एक हिस्सा है, जो सरकार को डराने के लिये किया जा रहा है कि- आपकी पुलिस हमारे सामने नतमस्तक है। पुलिस कर्मियों की रिहाई परिवारजनों व गांव के लोगों की सहानुभूति अर्जित करने का एक प्रयास हो सकता है। नक्सली सरकार के ग्रीन हंट और अपने साथियों की गिरफ़्तारी से इस समय दबाव में हैं। पुलिस कर्मियों के अपहरण की छत्तीसगढ़ में यह पहली वारदात है। इससे पूर्व वे ग्रामीणों का अपहरण कर ले जाते थे और उनमें से बहुत कम ही लौटते थे। अधिकांश की गला रेतकर हत्या ही हुई लेकिन हाल ही नक्सलियों ने एक एसपीऔ की गर्भवती रिश्तेदार का अपहरण कर अपने पास रखने के दो दिन बाद छोड़ दिया। अपहृत व बंधक बनाये गये पुलिस कर्मियों को छुड़वाने कोई बातचीत पुलिस से नहीं हुई। पुलिस या सरकार नक्सलियों की मांगों को पूरा करने में असपर्थ थी। ऐसे में बंधक बना ये पुलिस जवानों की जान बचाने की ज़िम्मेदारी मानव अधिकार से जुड़े लोगों और मीडिया की थी जिसमें मीडिया एक तरह से अपने मकसद में कामयाब हो गई। डीजीपी विश्वरंजन ने मीडिया को इस पहल के लिये जहां धन्यवाद दिया है, वहीं उन्होंने यह भी कहा है कि बुनियादी कारणों से सरकार नक्सलियों से लड़ रही है। यह लड़ाई जारी रहेगी। डीजीपी इसे बुनियादी जरूर कह रहे हैं लेकिन इस लड़ाई में कुछ निर्दोष लोग भी पुलिस जवानों के आक्रोश के शिकार हो रहे हैं। ताजा घटना सुकमा की है, केरलापाल के साप्ताहिक बाजार में नक्सली हमले के बाद सीआरपीएफ ने ग्रामीणों पर कहर बरपा दिया। इस हमले में दो जवान घायल हो गये थे। इसके बाद फोर्स उत्तेजित हो गई और जो मिला उसकी पिटाई कर दी। नक्सलियों और पुलिस के बीच इस समय चूहा- बिल्ली का खेल है। जो जीता वही सिकंदर!