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हड़ताल या जनता को तकलीफ

रायपुर, दिनांक 6 सितंबर 2010
हड़ताल या जनता को तकलीफ़
सरकार क्यों नहीं होती सख्त?
जब कम वेतन पाने वाले और अधिक वेतन की मांग को लेकर आंदोलन करें तो बात समझ में आती है, लेकिन जब ज्यादा वेतन और सारी सुख- सुविधा भोग रहे लोग वेतन की मांग को लेकर काम बंद करें, तो ऐसा लगता है कि यह आम लोगों के साथ अति कर रहे हैं। हड़तालों का मौसम फिर शुरू हो गया है। इसी मद्देनज़र हम उन बातों को फिर दो हराने के लिये मजबूर हो गये जो हम सदैव से कहते आ रहे हैं कि- सरकार को उसी हड़ताल या आंदोलन की अनुमति देनी चाहिये जिनका आम उपभोक्ता के रोजमर्रे की आवश्यकताओं से कोई ताल्लुक न रखता हो। अब अगर देश के पेट्रोल पंप वाले हड़ताल करने लगे तो आम जनता क्या करेगी? बैंक वाले हड़ताल पर चले जाते हैं, तो देश की सारी आर्थिक लाइन गड़बड़ा जाती है। नगर निकाय के सफाई, फायर ब्रिगेड , पानी वितरण करने वाले हड़ताल पर बैठ जाये तो आम जनता का बुरा हाल हो जाता है। मंगलवार को प्रदेश के सरकारी कर्मचारी मंहगाई को लेकर हड़ताल पर जा रहे हैं। ठीक है मंहगाई आज सभी की समस्या है, लेकिन क्या हड़ताल से मंहगाई दूर हो जायेगी? यह तो ऐसा लग रहा है कि मंहगाई की आड़ में एक रोज छुट्टी मारने का मजा ले रहे हैं लोग। बुधवार सात सितंबर को स्टेट बैंक के प्रबंधन ने ऐलान कर दिया है कि ग्राहक सात सितंबर से पहले अपने बैंक से सबंन्धित काम काज निपटा लें। चूंकि उनके कर्मचारियों ने देशव्यापी हड़ताल पर जाने की धमकी दी है। बैंक कर्मचारी शुरू से मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह वेतन लेते रहे हैं। आज भी उन्हें सम्मान जनक वेतन प्राप्त होता है। उन बेचा रे रोज कमाने- खाने वालों की बनिस्बत इस वर्ग का वेतन चार से पांच गुना है। ऊपर से बैंक में काम करने वालों के कार्यो से आम जनता को संतोष भी नहीं है। कई लोग दुर्व्यवहार के भी शिकार होते हैं। बैंक कर्मी ही शायद देश में ऐसे हैं जो सर्वाधिक हड़ताल करते हैं। इसी महीेने की बाइस तारीख को उपभोक्त ाओं से सीधा जुड़ा एक अन्य वर्ग हड़ताल पर जाने वाला है। यह वर्ग है पेट्रोल-डी जल बेचने वालों का। इनकी माँगें जो भी हो, यह सरकार और इनके बीच का मामला है। इसे इन दोनों को मिल बैठकर हल करना चाहिये या सरकार को सख्ती बरतकर ऐसे हड़तालों पर लगाम लगानी चाहिये लेकिन यह नहीं होता । हड़तालें लम्बे समय तक खिंचती हैं। आम उपभोक्ता परेशान होता रहता है और अंतत: हड़ताल या तो समझौते के बाद मिठाई मुंह में ठूंसकर बंद हो जाती है या फिर सरकार की सख़्ती का डंडा चलता है। अगर यह डंडा शुरू में ही चले तो हड़ताल की नौबत ही न आये। देश की आबादी के अनुसार अब हड़तालों का मतलब है लाखों- करोड़ों लोगों की परेशानियां। सरकार को इस पर संज्ञान देने की जरूरत है। चंद लोगों की सुख- सुविधा के लिये की जाने वाली हड़तालों पर आम जनता को क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है?

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