गुरुवार, 9 सितंबर 2010

तो मंदिर-मस्जिद विवाद नहीं होता!

दिनांक 10 सितंबर 2010
उसी समय त्वरित फैसला हो जाता
तो मंदिर-मस्जिद विवाद नहीं होता!
न्याय में देरी का नतीजा कितना भयानक होता है- इसका जीता जागता उदाहरण है अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद। अगर चौंसठ साल पहले उपजे छोटे से विवाद का निपटारा उसी समय सही ढंग से कर दिया जाता। तो शायद आज देश इतने बड़े संकट व परेशानियों के दौर से नहीं गुजरता। राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद इस समय हाईकोर्ट में हैं। कोर्ट संभवत: इस महीने की चौबीस तारीख को अपना फैसला सुनायेगा। फैसले से पूर्व जो स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। वह यही कह रही है कि यह मामला शायद फैसले के बाद भी इतनी आसानी से सलटने वाला नहीं। हो सकता है संबंधित पक्ष सर्वोच्च न्यायालय की शरण लें। इस बीच यह मांग भी उठ रही है कि संसदीय दायरे में रहकर इस मामले को निपटा या जा ये। इस पूरे मामले की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर एक नजर डालें तो विवाद 22-23 दिसंबर 1949 को उस समय शुरू हुआ था। जब कथित तौर पर मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखनी शुरू हुई और राम चबूतरे पर पूजा अर्चना शुरू हुई। हिंदुओं का दावा है कि यहां पूर्व में जो मंदिर था उसे तोड़कर मस्जिद बनाया। जबकि यह विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है। इस मामले में दोनों ही समुदाय का अपना- अपना तर्क है। जिसपर बहस करने से कोई फायदा नहीं। हम मानते हैं कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद स्थल के विवादित स्थल का महत्व ऐतिहासिक व धार्मिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट क्या फैसला देती है- इसे आने में अभी कम से कम दो हफ्ते का समय लगेगा। फै सला किसी एक समुदाय को हश्रित कर सकता है तो दूसरे को आक्रेाति कर सकता है। ऐसे में संपूर्ण देश को इस मामले में सतर्क होने व संपूर्ण मसले को धैर्य से समझने की जरूरत है। फैसले के परिप्रेक्ष्य में किसी अनहोनी की आशंका में कई लोगों ने इस दिन और आगे के कुछ दिनों की ट्रेन यात्रा तक स्थगित कर दी है। देश 19 वें दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की परिस्थितियों का गवाह है और उसे इसके पुनरावृत्ति का भय भी सता रहा है। ऐसे में जो भी फैसला होगा। उसपर दोनों समुदाय को सिर्फ गौर करने की जरूरत है। चूंकि इस फैसले के ऊपर और दूसरा फैसला देने के लिये भी पॉवरफुल अदालत है जिसका निर्णय सभी को स्वीकार करना होगा। हमारी राय में एक ऐसा फैसला इस मामले में आना चाहिये जो सभी को मंज़ूर हो। मगर इसकी संभावना कम ही है। ऐसे में सरकार को इस स्थल को राष्ट्रीय धरोहर के रूप मे सुरक्षित कर देना चाहिये। ताकि दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव कायम रहे। सरकार को चाहिये कि वह इस मुद्दे पर सभी पक्षों से बात कर दोनों समुदाय के लिये विवादित स्थल के समीप ही नई भूमि आंवटित करें। जिसमें वे चाहे मंदिर बना ये या मस्जिद। अतीत में जो कुछ हुआ उसे बदला तो नहीं जा सकता लेकिन इसको लेकर भावी पीढ़ी को टकराव से बचाने का एक ही उपाय है कि विवादित स्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाये तथा बाजू में दोनों पक्षों को बराबर- बराबर भूमि का आंवटन किया जा ये।