पर्यावरण पर ध्यान दो वरना नये नयेरोग मानवता का खात्मा कर देंगे!

रायपुर दिनांक 13 सितंबर
पर्यावरण पर ध्यान दो वरना नये नये
रोग मानवता का खात्मा कर देंगे!
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि मच्छर और मलेरिया के खिलाफ सरकार का अभियान चल रहा है। करोड़ों रूपये मच्छरों को मारने के लिये अब तक तक खर्च किये जा चुके हैं लेकिन न मच्छर मरे और न मलेरिया का उन्मूलन हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट यह बता रही है कि दुनिया में सालाना 10 लाख से ज्यादा लोग मच्छर जनित रोग से मरते हैं। इसके अलावा दूसरे अन्य रोग भी फिर इस धरती पर लौट आये हैं जिसमें काला आजार, चिकनगुनिया,डेंगू, दस्त, टायफाइड़, स्वाइन फलू शामिल है। दिल्ली जहां कुछ ही समय में राष्ट्रमंडल खेल होना है। वहां डेंगू महामारी का रूप ले चुका है। देश के अनेक भागों में भारी वर्षा और बाढ़ की स्थिति है। विदेश की बात करें तो वहां भी कतिपय रोग जानलेवा बनकर कहर ढा रहे हैं। ऐसे रोगों ने लोगों में दहशत की स्थिति पैदा कर दी है। सुपरबग नामक बीमारी एंटीबायोटिक के दुरुपयोग की वजह से शुरू हुई। जबकि साबिया वायरस, एल्टीचिया बैक्टीरिया, रिट वैली वायरस आदि सूक्ष्मजीवी तो अभी तक रहस्य ही बने हुए हैं। एक जानलेवा वायरस ऐसा है, जिसे अब तक नाम भी नहीं दिया जा सका है। वैज्ञानिक इसे 'एक्स वायरसÓ कह रहे हैं। ऐसे अनेक खतरनाक सूक्ष्मजीवी हैं, जिनकी पहचान तक नहीं हो पाई है। ज्यादातर सूक्ष्मजीवी परजीवी होते हैं। ये किसी जीवित कोशिका पर ही पलते-बढ़ते हैं। मलेरिया के कारक के बारे में बताया जाता है कि यह सूक्ष्मजीवी 'प्लाजमोडियमÓ शरीर की लाल रक्त कणिकाओं में पलता और विकसित होता है। एक रक्त कणिका पर यह तब तक पलता-बढ़ता है, जब तक कि वह रक्त कण नष्ट न हो जाए। इस तरह शरीर के आवश्यक लाल रक्त कण समाप्त होने लगते हैं और प्लाजमोडियम बढ़ता रहता है। धीरे-धीरे आदमी की मृत्यु हो जाती है। चिकित्सा व्यवस्था देश में आज मुनाफे वाला उद्योग बन गया है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जगह पांच सितारा अस्पतालें खोलना सरकार की मुख्य प्राथमिकता बन गई है। जनता के पैसों से खुलने वाले इन अस्पतालों में आम आदमी के उपचार की सहूलियतें न के बराबर हैं। दवा बनाने और टॉनिकों का धंधा करने वाली बड़ी कंपनियों ने रोग और दवा का ऐसा बाजार कायम कर लिया है कि सामान्य व्यक्ति अपनी कमाई का एक बडा हिस्सा उपचार और दवा के लिए खर्च करने पर मजबूर है। करोड़ों लोग गरीबी के कारण अनेक जानलेवा बीमारियों के साये में जीने मजबूर हैं। दुनिया की कुल आबादी का पांच वां हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करता है। कुल जनसंख्या के एक तिहाई बच्चे कुपोषित हैं। आधी से ज्यादा आबादी अत्यंत जरूरी दवाएं भी नहीं खरीद पाती। केंद्रीकृत आर्थिक व्यवस्था ने करोड़ों लोगों को जीविकोपार्जन के लिए शहरों की ओर जाने को बाध्य कर दिया है। चिकित्सा जगत कई रोगों के सामने लाचार है। सभी संवेदनशील आधुनिक चिकित्सा शास्त्री एक स्वर में अंग्रेजी दवाओं के न्यूनतम प्रयोग की बात कर रहे हैं, लेकिन बाजार की ताकतें इसे अनसुनी कर अनावश्यक दवाओं का ढेर लगा रही हैं। रोगों से मुकाबला करने के लिये पर्यावरण पर ज्यादा ध्यान देना होगा। वरना नये- नये रोग मानव का सर्वनाश कर डालेगें।

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