बुधवार, 29 सितंबर 2010

कब तक दुष्टों को झेलती रहेंगी हमारी जेलें?

रायपुर, दिनांक 29 सितंबर

कब तक दुष्टों को झेलती रहेंगी हमारी
जेलें? क्यों नहीं निपटाते इन्हें?
एक दुष्ट सुरेंद्र कोली का नाम और जुड़ गया भारतीय जेल के सींखचों के पीछे, जिसे देश के कानून के मुताबिक फाँसी के फंदे पर लटका ना है-इसके पूर्व भारतीय संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु, मुम्बई में अंधाधुंध हमला कर कई निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारने वाला आमिर अजमल कसाब जैसा आंतकवादी भी जेल में पड़ा- पड़ा भारतीय रोटी खा रहा है.... और तो और कसाब ने मंगलवार को सुरक्षा प्रहरी पर हमला भी कर दिया। हम कब तक ऐसे दुष्टों को सहते रहेंगे? क्यों नहीं हमारे कानून को इतना कड़ा कर दिया जाता कि अपराध करने वाले घिनौने व्यक्तियों को तमाम दूसरे कानूनों से हटकर ऐसी सजा दी जाये कि और कोई दूसरा ऐसा करने की हिम्मत ही न कर सके। सुरेन्द्र कोली हो या कसाब एक ही चट्टे बट्टे के लोग हैं जिन्हें समाज व न्याय पालिका दोनों ही उनसे जीने का अधिकार छीन चुकी है। फिर उन्हें जेल में रख कर और रोटी खिलाने का औचित्य क्या? आज कानपुर से एक खबर आई कि कक्षा छठवीं में पडऩे वाली एक बारह साल की बच्ची से स्कूल में ही किन्हीं दरिन्दों ने रेप किया और उसे मरणासन्न स्थिति में घर पहुंचाया। जहां से उसे उसकी मां ने उसे अस्पताल पहुंचाया जहां अधिक रक्त स्त्राव के कारण उसकी मौत हो गई। एक अरब बीस करोड़ की आबादी वाले देश में यूं तो ऐसे दरिन्दों को छांटकर निकालना और उन्हें समाज के सारे क्रियाकलापों से सदैव के लिये मुक्त करना इतना आसान नहीं है। किंंतु हम, जो पकड़ में आते हैं उनको तो कम से कम ऐसी कठोर सजा दे सकते हैं जिससे समाज पर इसका गहरा असर पड़े। ऐसा करने में कौन सी बाधा आ रही है? क्यों हमें ऐसे दुष्टों को झेलने के लिये मजबूर किया जा रहा है? यद्यपि सरकार ने मामलों को जल्दी निपटाने के लिये फास्ट ट्रेक अदालतें जैसी व्यवस्था की है किंतु इन अदालतों के फैसले चुनौती पर चुनौती में वर्षो निकल जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी पहुँचकर यह मामले फैसले के बाद भी व्यवस्थापिका की फाइलों में वर्षो निकल जाते हैं। यह भी आश्चर्य का विषय है कि जिन लोगों को न्यायपालिका के निर्णयों को अमल में लाना है, वे ही कहते हैं कि- न्याय में देरी हो रही है। जबकि उनकी स्वयं की व्यवस्था ऐसी है कि फांसी जैसे निर्णयों को अमल में लाने में वर्षो निकल रहे हैं। आज की स्थिति में पूरे देश में पांच दर्जन से ज्यादा फाँसी के निर्णयों को अमल में लाने की फाइलें सरकारी मुहर के लिये गृह मंत्रालय या राष्ट्रपति भवन में धूल खा रही हैं। कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फाँसी देने के बाद से देश में कोई फाँसी नहीं हुई। जबकि अदालतों ने इस अवधि में कई लोगों को फाँसी पर लटका ने का आदेश जारी किया है। न्यायालय के निर्णय पर अमल नहीं होने या प्रक्रिया में देरी का ख़ामियाज़ा आम आदमी भुगत रहा है, जो कहीं न कहीं किसी दुष्ट का शिकार हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला हो या न हो इसपर अपना निर्णय मात्र दो घंटे की सुनवाई के बाद दिया। क्या देश में पकड़े गये चंद दुष्टों के भविष्य के बारे में भी फैसला कुछ इसी तरह नहीं लिया जा सकता?