शनिवार, 11 सितंबर 2010

वरना देश आलसी हो जायेगा!

रायपुर दिनांक 11 सितंबर 2010
पहले गरीब छाटों फिर सुविधाओं से
लादों, वरना देश आलसी हो जायेगा!
इसमें दो राय नहीं कि समाज के गरीब तबके के उत्थान हेतु सरकार को प्रयास करना चाहिये लेकिन इस मामले में अति उत्साह या वोट की राजनीति दोनों ही घातक हो रही है। दो रूपये किलो चावल हो या मुफ़्त में गैस वितरण अथवा मुफ़्त में बिजली बांटने का काम। इन सब योजनाओं में उत्पन्न ख़ामियाँ अब परेशानी का सबब बनती जा रही हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि हर आदमी को कोई न कोई काम करते रहना चाहिये, लेकिन अभी की सरकारें क्या कर रही हैं। इंसान को एक साथ घर बैठे सारी सुविधाओं से लाद कर शराबी,जुआरी और अन्य सामाजिक बुराइयों का एडिक्ट बनाया जा रहा है। असली गरीब असहाय और अन्न के एक- एक दाने के लिये मोह ताज हैं तो दूसरी तरफ ऐसे लोग सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाकर ऐश कर रहे हैं। जो किसी समय तक कोई भी सुविधा नहीं मिलने से मेहनत कर अपना व अपने परिवार का भरण- पोषण करते थे। सरकार ने गरीबों की मदद के नाम से अपना ख़ज़ाना खोलकर वास्तव में गरीब और मध्यम वर्ग के बीच खाई पैदा कर दी है। गरीब वर्ग का व्यक्ति सरकार की ढेर सारी सुविधाओं जिसमें राशन, बिजली, स्वास्थ्य,चूल्हा , मकान जैसी सुविधाओं को बराबर प्राप्त कर मध्यमवर्गीय से ज्यादा बिना किसी काम के मुफ़्त सुविधा प्राप्त कर रहा है। सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करने के सिवा उसने अन्य धन्धों को भी अपना लिया और छोटे- मोटे से कामों से मुंह मोड़ लिया। सरकारी सुविधाओं को प्राप्त कर वह सरकार का खास आदमी और यहां तक कि होने वाले हर मतदान में किसी न किसी एक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता भी बनकर रह गया। दूसरी ओर मध्यम वर्गीय परिवार अपने काम के लिये या तो नौकरी पर आश्रित होकर रह गया है या फिर किसी न किसी की दया पर। समाज में एक नये वर्ग की उत्पत्ति सरकारों की तरफ से हो रही हैं किंतु गरीब कौन? की परिभाषा तक तय नहीं कर पाई है। फिर किन गरीबों में वह योजनाओं का हिस्सा वितरित कर रही है? पहले समाज के असल गरीबों को छांटकर निकालों। उन्हें चावल, गैस, व खाने- पीने की वस्तुएँ सुलभ कराने की जगह उनके बच्चों को पढ़ाने- लिखा ने के लिये एक म़ुश्त राशि जो इस समय मुफ़्त में खाद्यान्न व अन्य वस्तुएँ बांटने के लिये खर्च की जा रही है। उसकी जगह फ़िक्स डिपाजिट में डाला जाय। ताकि आगे उनका भविष्य बन सके। गरीब परिवार के सदस्यों को मुफ़्त में अनाज व अन्य सुविधाएँ बांटने की जगह काम के बदले यह सुविधाएँ दी जा ये। वरना देश में एक बहुत बड़ा वर्ग आलसी व काम चोर हो जा ये, तो आश्चर्य नहीं। आज की स्थिति में मध्यम वर्ग को, जो कि अपने बल पर घर को चलाता आ रहा है। हर मामले में असहाय और कमजोर होता जा रहा है। चूंकि यह वर्ग पढा़- लिखा है और किसी राजनीतिक दल के झांसे में आसानी से नहीं फंसता। ग़रीबों को साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराने का दावा यूपीए करती है। किंतु यह गरीब कोैन से हैं और उनकी वार्षिक आय कितनी हैं? यूपीए सरकार अब, गरीबी रेखा से नीचे,जिसका कोइ्र्र आकलन नहीं हुआ है, के लोगों को मुफ्त नया गैस कनेक्शन देने की योजना बना रही है। अगले महीने, दो अक्तूबर को गांधी जयंती के मौके पर इस योजना का आगाज हो सकता है। सरकार के इस कदम से उन गरीब परिवारों को काफी मदद मिलेगी। हम राज्य व केन्द्र सरकार दोनों के सोच की तारीफ करते हैं लेकिन सुविधाएँ उसे मिले जो वास्तव में गरीब हो और उसके जीवन की पटरी बिना सहायता के नहीं चल रही हो।