शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

खाकी का कत्ल हो गया बिहार सरकार की आंखो के सामने!

रायपुर, दिनांक 3 सितंबर 2010
खाखी का कत्ल हो गया बिहार
सरकार की आँखो के सामने!
बिहार को फ्लैश बैक में ले जाया जा ये तो दिल्ली में मुख्य मंत्रियों की बैठक में नीतिश कुमार ही ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्होने नक्सलियंो के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का विरोध किया था। उन्होंने नक्सलियों से बातचीत कर समस्या का हल निकालने की सलाह दी थी। आज मुख्यमंत्री बिहार की जनता को अपना चेहरा कैसे दिखायेंगे जब उनके अपने राज्य में नक्सलियों ने मुठभेड़ में कई जवानों को मौत के घाट उतार दिया और चार को बंधक बनाकर सरकार से कहा कि वे पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर रखे गये उनके साथियों को छोड़े। वरना उनके द्वारा बंधक बनाकर रखे गये लोगों को मार दिया जायेगा। अड़तालीस घंटे से ज्यादा समय तक बंधक बना ये रखने के बाद दो को नक्सलियों द्वारा मारे जाने की खबर है। उन्होंने यह बता दिया कि वे अपनी धमकी को अंजाम देने में पीछे नहीं हटेंगे। नक्सलियों की हिमायत करने वाले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने यह जरूरी भी नहीं समझा कि इस मुद्दे पर नक्सलियों से बातचीत कर ऐसा कोई रास्ता निकाले जिससे नक्सली बंधकों की जान न ले सकें। नक्सलियों की मांग थी कि सरकार गिरफ़्तार किये गये नक्सली साथियों को रिहा करें , वैसे यह किसी भी सरकार के लिये संभव नहीं था किंतु हम इसके पीछे राजग शासनकाल में भारतीय विमान को अपहरण कर कंधार ले जाने की घटना पर नजर दौड़ाये तो यात्रियों को छुड़ाने के लिये सरकार को अपहरणकर्ताओं के सामने न केवल झुकना पड़ा। वरन हमारे विदेश मंत्री स्वंय आतंकवादियों को लेकर कंधार पहुंचे और बंधकों की रक्षा की। उस हिसाब से नक्सलियों द्वारा बंधक बनाये गये निर्दोष पुलिस कर्मियों को छुड़ाने के लिये कम से कम छुड़ाने का उप क्रम ही किया जाता तो उस परिवार को राहत मिलती, जो अपने लोगों को अपनी आंखों के सामने मरते देख रहे थे। इस संपूर्ण घटनाक्रम का बिहार में नक्सलियों के खिलाफ लड़ रहे उन पुलिस कर्मियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? इसकी कल्पना की जा सकती है। उन पुलिस कर्मियों के परिवार के आँसू और दर्दनाक चीखों को बिहार की पुलिस ने अपने परिवार के साथ जोड़कर देखा होगा। नक्सलियों की मांग और हिंसात्मक गतिविधियाँ जो भी हो वे जो कृत्य कर रहे हैं, वह किसी भी तरह न्यायोचित नहीं हैं। वे आम जनता की सारी सहानुभूति खो चुके हैं। उनके साथ अब पुलिस जो भी हरकत करें उसपर जनता का पूर्ण समर्थन ही मिलेगा। नक्सलियों ने अपहत पुलिस कर्मियों की न केवल हत्या की है बल्कि उनके पूरे परिवार को जीवित लाश बना दिया है। यह उन मासूम बच्चों के चेहरे पर देखा जा सकता है जिनकी आंखों के सामने उनके पिता को मौत के घाट उतार दिया गया और बे बस सरकार कुछ नहीं कर पाई-क्या यही है नक्सलियों का इंकलाब? बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने इस मामले में जिस ढंग से निष्क्रियता का रूख अख्तियार किया। वह यही दर्शाता है कि उन्हें अपने बंधक पुलिस कर्मियों और उनके परिवार से कोई सहानुभूति नहीं थी। एक बार बस गिरफ़्तार नक्सलियों को छोड़ने का नाटक ही रचा जाता तो शायद मुख्यमंत्री पूरे बिहार की जनता की सहानुभूति और प्रेम अर्जित कर लेते। इस कांड से अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों को भी सबक लेने की जरूरत है। कभी भी नक्सली इन राज्यों में ऐसी घटना को अंजाम दे सकते हैं जिसमें पूरे परिवार पर मुसीबत आ सकती है। सरकारों को ऐसे मामलों से निपटने के लिये तैयार रहने की जरूरत है।