बुधवार, 1 सितंबर 2010

घर में लगी है आग, पड़ोसी की खबर लेने चले..!

रायपुर, दिनांक 1 सितंबर 2010

घर में लगी है आग, पड़ोसी
की खबर लेने चले..!
गेहूं,चावल, चीनी की कीमत बढऩे के कारण अब बच्चों के लिये बिस्किट खरीदना मंहगा होगा। बिस्किट ही क्यों, बच्चे तो आजकल महँगा दूध भी तो पी रहे हैं। कुछ बच्चे तो ऐसे हैं जिन्हें दूध तो क्या रोटी भी नसीब नहीं होती। भारत की आबादी का कम से कम बयालीस प्रतिशत गरीब भूखा और नंगा हैं। यह हम नहीं कह रहे, सरकार द्वारा पेश आंकड़े बता रहे हें। हमारे माननीय सांसदों की तनखाह हाल ही तीन सौ गुना बढ़ा दी गई। वे अब हर महीने सब मिलाकर कम से कम एक लाख साठ हजार के आसपास सरकारी खज़ाने से पैसा निकालेंगे। यह पैसा आम आदमी की जेब से निकला हुआ टैक्स है। सासंद हमारे लिये क्या करते हैं ? इसका आकलन जनता खुद करे लेकिन हम बता दे कि लोकसभा में उनके हंगामें के कारण एक दिन की कार्यवाही स्थगित होने पर करीब एक करोड़ पैसठ लाख रूपये का नुकसान होता है। यह पैसा भी सरकार हमारे और आपके जेब से टैक्स के रूप में वसूल करती है। इस मानसून सत्र में संसद में माननी यों ने न केवल अपना वेतन बढ़ाने के लिये हंगामा किया बल्कि, अन्य अनेक मुद्दे जिससे आम जनता का कोई लेना- देना नहीं हैं, को लेकर संसदीय कार्य में व्यवधान डाला। इससे देश क ा पैंतालीस करोड़ रूपये यूं ही पानी में बहाना पड़ा। इस पैसे से देश के गरीब बच्चों को यूनीफ़ॉर्म और अन्य ज़रूरतों की पूर्ति कर उनमें से कइयों को इस लायक बनाया जा सकता था कि वे अपना जीवन सम्मान के साथ जी सकें। फ़िज़ूलख़र्ची,हमदर्दी में भी हमारी सरकार कम नहीं है। फ़िज़ूलख़र्ची के नाम पर एक मंत्री के पीछे दस- पन्द्रह कार और भी बहुत कुछ इसका सारा पैसा देश की जनता की जेब से निकाला जाता है। इस बीच यह भी पता चला है कि पंजाब के माननीयों ने तेर्ईस करोड़ रूपये का पेट्रोल घटक लिया है। देश में कई क्षेत्रों में बाढ़ आई हुई है। लोग बेघर बार हैं, उन तक सहायता भी नहीं पहुंच रही है। इसके अलावा देश की एक बड़ी आबादी के पास तन ढंकने के लिये कपड़े नहीं है , सर छिपा ने के लिये छत नहीं है। पेट की आग बुझाने के लिये अनाज नहीं है किन्तु हमारे गोदामों में लक्ष्य से ज्यादा अनाज एकत्रित कर रख दिया गया है। यह अनाज गोदामों में पड़ा सड़ रहा है किन्तु सरकार की जिद है कि चाहे लोग भूखे मर जाये। हम अनाज मुफ्त में नहीं बांटेंगे। अगर बात यहीं तक बन जाती तो हम अपने देश के हुक्मरानों को माफ कर देते किन्तु, वे तो इससे भी हद से निकल गये। एक तरफ देश की भूखी, नंगी जनता और बेरोज़गारी की लंबी फौज हैं, वहीं हमारी सरकार बेमानी और दुश्मन देश के सुख दुख में शामिल होकर विश्व से अपनी पीठ थपथपाने का इंतजाम कर रही है। पाकिस्तान में बाढ से हमारी सरकार को हमदर्दी है, होनी भी चाहिये लेकिन यह नहीं कि हमारे लोगों को भूखे और छत विहीन रखकर उनकी मदद करे। हमारी नदियों भी उफान पर है। देश के कई भागों में लाखों लोग बेघर बार हो गये हैं जिसपर हमारे दुश्मन पड़ोसी राज्य ने इसपर कोई सहानुभूति तक नहीं दर्ज कराई लेकिन हम यह सब करने में आगे हैं। अपने घर में लगी आग को छोड़कर हम अपने पड़ोसी के घर की आग ही नहीं उसके पेट की आग को भी बुझा रहे हैं। भारत सरकार ने पाकिस्तान को ढाई करोड़ डालर की मदद देने का फैसला किया है। अगर यह राशि भारत के ग़रीबों के हितों में खर्च की जाती तो संभव है, अधिकांश लोग सहायता पाने के बाद फिर कभी गरीब नहीं कहलाते।