मंगलवार, 3 अगस्त 2010

खेल पर राजनीति.... दुआ

खेल पर राजनीति.... दुआ
बददुआ का नया खेल...!
गुस्से में लोग क्या- क्या कह जाते हैं। मै तुझे श्राप देता हूं कि तू इस जन्म में कभी फलेगा फूलेगा नही, सत्यानाश हो तेरा, तू कभी नहीं सुधरेगा और भी न जाने क्या क्या? ऐसी बददुआएं पुराने जमाने में ज्यादा सुनने को मिलती थी अब वह जमाना गया अब लोग माडर्न तरीके से लोगों का सर्वनाश करने में लगे हैं लेकिन हमारे केन्द्रीय मंत्री मणिशंकर अयैर इन दिनों सुर्खियों में हैं राष्ट्रमंडल खेलों के लिये बददुआएं देने के कारण। वह पता नहीं किससे नाराज हैं परन्तु राष्ट्रमंडल खेल का आयोजन उन्हें दिल्ली में बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है वे कहते हैं कि यह आयोजन एक फिजूल खर्ची हैं, वैश्यावृत्ति को बढ़ावा देगा आदि आदि। यह बयान वे पहले भी दे चुके हैं, उस समय हमने उनके बयान का कुछ हद तक इन कालमों में सपोर्ट किया था, यह कहते हुए कि देश में जब मंहगाई है तब इस आयोजन पर पैतीस हजार करोड़ रूपये खर्च करने का क्या तुक? इससे किसका फायदा होने वाला? हम अपने उस कथन पर आज भी कायम हैं। दिल्ली देश की राजधानी है वहां यह आयोजन हो रहा है। इस आयोजन से देश का गौरव बढ़ेगा। एक फायदा हमें यह होगा किन्तु लाखों करोड़ों लोग आज भूखे नंगे सोते हैं जिन्हें सर छिपाने के लिये छत नहीं है उनको इस खेल से क्या फायदा होगा? भलै ही मणिश्ंाकर अयैर इस आयोजन को किसी दुर्भावना से प्रेरित होकर उठा रहे होंगे लेकिन बात तो उनकी पते की लगती है। इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के लिये दिल्ली की बनी बनाई चमचमाती सड़कों को उजाड दिया और उसे फिर से बनाने के लिये करोड़ों रूपये फिर से खर्च किये गये, इसी प्रकार देश विदेश से आने वाले खिलाडियों अतिथियों व अन्य साज सामान व सुविधाओं पर ऐसे समय करोड़ों रूपयें खर्च किया जायेगा जब मंहगाई के कारण आम आदमी की परेशानियां बडी हुई है। शायद इसी दर्द से अयैर ने आयोजकों पर यह तीखा प्रहार किया है कि जो लोग इस आयोजन का संरक्षण कर रहे हैं वे शैतान ही हो सकते हैं भगवान नहीं। अयैर की बददुआ इसी से खत्म नहीं होती वे यह भी कहते हैं कि मुझे दिल्ली में हुई लबालब बारिश से बहुृत खुशी हुई मैं चाहता हूं कि यह आयोजन न हो। बारिश से किसानों को फायदा होगा मैं इससे खुश हूं। एक आम भारतीय भी यही चाहता है कि ऐसे समय में देश में ऐसा कोई आयोजन न हो जो फिजूलखर्ची कर उनकी जेब से और पैसा निकालने के लिये मजबूर करें। हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी आयोजन उस समय करें जब देश का हर आदमी अच्छे कपड़़े पहन,े हर घर का बच्चा शिक्षित हो, हर परिवार में कोई न कोई नौकरी पर हो, हर आदमी के पास रहने के लिये छत हो, स्वास्थ्य संबन्धी सुविधाएं उपलब्ध हो। देश की आधी से ज्यादा जनता आज गरीबी में जीवन यापन कर रही है। मध्यम वर्ग की हालत भी कमजोर है। ऐसे में किसी आयेाजन पर पैतीस हजार करोड़ रूपये जो देश के बजट के बराबर हो खर्च कर किसका भला किया जा रहा है। हो सकता है मणि शंकर का दर्द दिखावा हो चूंकि उन्होंने वर्तमान खेल स्थल की जगह दूसरे स्थल पर खेल के आयोजन का सुझााव दिया था जो माना नहीं गया लेकिन उससे हुई नाराजी से जो भाव निकलकर आये वह देश की जनता के पक्ष में ही जाता दिखाई दे रहा है। यूं ही देश में खेेलों की स्थिति आज उतनी अच्छी नहीं है। क्रिकेट बदनाम हो चुका है्र हाकी में चरित्र हनन के किस्सों का बाजार गर्म है और अब राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी क्या क्या रंग आगे दिखायेगी कहा नहीं जा सकता।