मंगलवार, 3 अगस्त 2010

लोकतंत्र के नुमाइन्दों की राजशाही,

लोकतंत्र के नुमाइन्दों की राजशाही,
चोराहों पर क्यों लगाया जाता है जाम?

बहनजी याने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का काफिला जब सड़कों से गुजरता है तो उनकी सुरक्षा के लिये सड़कों के आजू -बाजू मौजूद दुकानों के शटर तक गिरवा दिये जाते हैं टै्रफिक पूरी तरह जाम हो जाता है। कम से कम साढ़े तीन सौ पुलिस वालों की पूरी सेना उनके आगे पीछे लगी रहती है- हम इसका जिक्र यहां छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निकलने वाले मंत्रियों की शाही सवारियों के संदर्भ में भी कर रहे हैं । यह सवारियां हालाकि मायावती का मुकाबला नहीं करती किन्तु आजकल यहां भी इसके चलते सामान्यजन को किसी भी चैराहे पर गर्मी में लू के थपेड़े और ठंड तथा बरसात के दिनों में मौसम की मार झेलनी पड़ती है। क्या हम इस व्यवस्था को लोकतंत्र कहे या लोकतंत्र में राजतंत्र की घुसपैठ? आम जनता के बीच से चुने हुए जनप्रतिनिधियों को सत्ता के ंिसंहासन पर बैठने के बाद इतना खतरा कैसे उत्पन्न हो जाता है कि वह वोटरों से ही घबराने लगते हैं? मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद एसपीजी की कवर सेक्युरिटी मांगी जो सिर्फ प्रधानमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री को मिलती है। पद में बैठे नेताओं को सुरक्षा दी जानी चाहिये लेकिन जनता के अधिकारों का हननकर तथा उनकी दिनचर्या को रौंदकर दी जाने वाली इस सुरक्षा का औचित्य क्या है? सुरक्षा के नाम पर जो भी चल रहा है वह किसी राजशाही व्यवस्था से कम नहीं है? छत्तीसगढ़ में मंत्रियों का काफिला सड़क पर आते ही हर वर्ग को चैक चैराहे पर उस समय तक रोक दिया जाता है जबतक मंत्रियों का काफिला गुजर नहीं जाता। इस समय जबकि गर्मी पूरे शबाब पर है किसी का घर से बाहर निकलना मुश्किल है तब जबकि इक्के दुक्के जरूरतमंद ही सड़कों पर होते हैं तब ऐसे किसी व्यक्ति को बीच चैराहे पर धूप में खडे कर माननीयों को कौन सी सुरक्षा दी जा रही है? इसी सोमवार को मंत्रीगण पार्टी चुनाव के लिये कई बार सड़कों पर से गुजरे- कई बार चैराहों पर पुलिस ने लोगों को डंडों के बल पर ब्लाक किया । घड़ी चैक पर तो भीड़ बेकाबू हो गई और उसने जाम का विरोध किया। इसमें दो मत नहीं कि नक्सल प्रभावित इस राज्य में सार्वजनिक संपत्ति के साथ-साथ मंत्रियों विधायकों और अन्य बड़े अधिकारियों के जीवन को खतरा है किन्तु इतना भी नहीं कि आम आदमी का रास्ता रोक उनके लिये रास्ता बनाया जाये। वैसे भी माननीयों की गाड़ी में लगे रेड़ लाइट और सायरन की आवाज से लोग जान जाते हैं कि शाही सवारी आ रही है फिर चैराहों पर जाम क्यों लगाया जाता है? शायद इसलिये तो नहीं कि शाही लोग अपने उन वोटरों के दर्शन के लिये कुछ देर तक तपे जिनके बलबूते वे इन वातानुकूलित वाहनों की सवारी कर रहे हैं। शाही सवारी में घूमने वाले माननीयों को यह ध्यान में रखना चाहिये कि जनता के हितों की रक्षा से बढकर और कुछ भी नहीं है!