बुधवार, 4 अगस्त 2010

बड़ीं दुकानों में बड़ी धांधली, कैसे बेचते

रायपुर बधुवार।दिनांक 4 अगस्त 2010
एम.ए. जोसेफ
बड़ीं दुकानों में बड़ी धांधली, कैसे बेचते
हैं,कम दाम पर कीमती वस्तुएं?
ऊंची दुकान, फीके पकवान-छत्तीसगढ़ बनने के बाद प्राय हर बड़े शहरों में ऊंची- ऊंची, हाय फाय शो बाज दुकाने, होटल और मोल का कारोबार तेजी से बढ़ा है। अपने बाहरी आकर्षण और तड़क भड़क से यह ऊंची दुकानें लोगों को अपनी ओर खींचने में कामयाब हो रही हैं किन्तु असलियत क्या है यह उपभोक्ताओं को पता नहीं। हाल ही इन दुकानों में से कुछ पर छापे की कार्रवाही में जो रहस्योद्घाटन हुए हैं वह चैका देने वाले हैं। जो लोग रायपुर की खुली दुकानों का रास्ता छोड़ इन बड़ी दुकानों की तरफ झुक गये थे उन्हें हाल ही इस बात का झटका लगा है कि यह दुकानें भी मिलावट व आउट डेटेड़ अनाज बेचकर लोगों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। एक बिग बाजार से जो दाल के नमूने लिये गये वह न केवल फफूंद लगे थे बल्कि उसमें कीड़े भी लग गये थे। स्वाभाविक है कि ऐसी दाल किसी काम की नहीं है और इसे सस्ते दाम पर बेचने से भी किसी को कोई नुकसान नहीं हैं। बाजार में मिलने वाली दाल से सस्ते में मिलने वाली दाल या अन्य किसी भी खाद्यान्न के प्रति लोगों का झुकाव होना स्वाभाविक है। इस मामले में कहा जाता है कि इन बड़े संस्थानोंं के प्रति आकर्षण से बाहर के व्यापारियों का धंधा मारा जा रहा था इसी कारण छापे की कार्रवाई करवाई गई। सत्यता कितनी है यह जांच से ही स्पष्ट होगा। बहरहाल ऊंची दुकानें भी अब विवाद के घेरे में आ गई हैं। अब लोग इस बात पर भी उंगली उठाने लगे हैं कि कतिपय मोल और अन्य ऐसे ही बिग बाजारों में बेचे जाने वाले कपड़े व अन्य साधनों को बाजार की दर से कम दाम में बेचे जाने का राज क्या है। बताया जाता है कि कंपनियों में जो माल आउट आफ डेट होता है उसे थोक के भाव यह ऊंची दुकानवाले कम कीमत में खरीद लेते हैं और उसे उन्हें अपने हाय फाय बने संस्थानों से कम दाम पर आसानी से बेच देते हैं। ग्राहकों को आकश्रित करने के लिये आकर्षक शो रूम वाले मोल कपड़े व अन्य साधनों के साथ या तो कोई गिफट रखते हैं या फिर एक वस्तु लो तो दूसरा मुफत आदि का प्रलोभन देकर ऐन केन प्रकारेण अपना सस्ते में खरीदा हुआ माल ऊंचे दाम पर बेच देते हैं। राजधानी रायपुर में बडे महानगरों से आयतित इस नये व्यापार के प्रवेश का तरीका महानगरों से भिन्न है वहां माल अच्छा देने का प्रयास किया जाता हैं और यहां अपने द्वारा खर्च किये गये पैसे को ग्राहकों से वसूल करने का प्रयास किया जा रहा है। मुम्बई, मद्रास, बंगलोर जैसे महानगरों के मोल में ताजी सब्जी से लेकर हर घरेलू उपयोग की वस्तु एक ही छत के नीचे मिल जाती है किन्तु यहां जो सिलसिला शुरू किया गया है वह एक छत के नीेचे बहुत कम वस्तुओं की उपलब्धता के साथ है। इसके अलावा यहां जितने मोल हैं उनमें जो सिनेमागृह बनाये गये हैं उनकी टिकिट भी बहुत ज्यादा है जो आम आदमी की सहन शक्ति के बाहर है। असल में इनपर अब तक सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और वे उपभोक्ताओं के साथ सीधे सीधे मनमानी कर रहे हैं।