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हर मोड़ पर मनचलों की छीठाकशी

रायपुर शनिवार।दिनांक २८ अगस्त २०१०

हर मोड़ पर मनचलों की छीटाकशी
बे बस युवतियों,कौन बचायें इन्हें?
अभी दो रोज पहले की बात है मैं काली बाड़ी चौक में खड़ा जगदलपुर से आ रही बस में अपने परिवार के सदस्यों का इंतजार कर रहा था। मैरे पास से दो तीन लड़के निकले, दिखने मेे सीधे साधे -वे बात करते हुए आगे निकल गये , वहीं सामने से दो तीन लड़कियाँ भी आ रही थी। मैने देखा कि उन लड़कों में से एक ने उन लड़कियों से छेडखानी करते हुए कोई ऐसी बात कही कि वह तिल मिला उठी सभ्य घरानों की इन लड़कियों ने सड़क में कोई सीन क्रियेट करना उचित नहीं समझा, वे सिर झुकाएं आगे बढ़ गई। इस वाक्यें से मेरे मन में कई विचार आये-पहला यह कि आज के हालात में लड़कियों का सड़क पर निकलना कितना कठिन है। सीधे साधे दिखने वाले युवक भी कैसा दु:साहस कर बैठते हैं? दूसरी बात कि सड़क पर चलने वाली महिलाओं ने अगर ऐसे किसी व्यक्ति को जवाब दे दिया तो उन्हें इसका ख़ामियाज़ा दूसरे ढंग से भी भुगतना पड़ सकता है। इस बीच अगर मेरे जैसे किसी व्यक्ति ने इस प्रकार की छेडख़ानी का विरोध कर दिया तो शायद इसका प्रतिफल मुझे या जो भी विरोध करें उसे ही भुगतना पड़ेगा। छेड़छाड़ की शिकार होने वाली अधिकांश लड़कियाँ भी इसके लिये दोषी हैं जो अपनी तड़क भड़क से मनचलों को अपनी और आकर्षित करती है और छेड़छाड़ का शिकार हो जाती हैं। फैशन,ग्लैमर और आधुनिक पहनावे से अपने आपको सुन्दर दिखाने के चक्कर में बहुत सी युवतियों छेड़छाड़ की शिकार होती है। मन चले युवकों पर राजधानी रायपुर में पुलिस का शिकंजा कितना कसा है यह तो हम नहीं जानते लेकिन हम जो आंकलन करते हैं वह यही दर्शाता है कि रायपुर शहर की नब्बे प्रतिशत छात्राएं, युवतियां व महिलाएं मनचलों की छीटाकशी और छेड़छाड़ का शिकार होती है। कोई इन मनचलों से सड़क पर लडऩे की हिम्मत नहीं करती औैर अधिकांश अपनी इज़्ज़त को बना ये रखने के लिये कोई प्रतिरोध नहीं करती, इसका फायदा यह मन चले उठाते हैं। आवारा किस्म के लड़कों के अलावा सभ्य घरानों के कुछ बिगड़े नवाब भी सड़कों पर मौजूद रहते हैं जिनका काम सिर्फ यही है। पुलिस इस मामले में अभियान ज़रुर चलाती है लेकिन उसके इस अभियान का कोई खास फायदा हुआ हो यह नहीं कहा जा सकता। सर्वाधिक छेड़छाड़ की शिकार स्कूल जाने वाली वे छात्राएं होती हैं जिन्हें किसी नुक्कड़ या सुनसान इलाके से निकल कर स्कूल कॉलेज जाना होता है। असल बात यह है कि मनचलों के आगे युवतियों व महिलाएं बे बस हैं वे छेड़छाड़ की शिकायत अपने परिवार के सदस्यों से भी नहीं करती क्योंकि उनको इस बात का डर रहता है कि ऐसा करने पर उन्हें इससे और परेशानी हो सकती है। उत्तेजित परिवार के सदस्य कुछ कर न बैठे इसका डर भी उन्हें सताता है। पुलिस में इस समय काफी संख्या में महिलाओं की भर्ती की गई है। पुलिस के बड़े अफसरों को चाहिये कि वे सादे वेष में महिला पुलिस को सड़क पर जगह जगह उतारे और शहर में महिलाओं के साथ क्या होता है इसका पता लगायें। जब तक मनचलों को इस बात का अहसास नहीं होगा कि जिनको छेड रहे हैं वह महिला पुलिस भी हो सकती है तब तक इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता है।

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