गुरुवार, 19 अगस्त 2010

उबाऊ प्रजातांत्रिक व्यवस्था,

रायपुर शुक्रवार।दिनांक 20 अगस्त 2010

उबाऊ होती जा रही है वर्तमान प्रजातांत्रिक
व्यवस्था,क्यों न हो डायरेक्ट इलेक्शन?
हमारे जन प्रतिनिधि, उन्हें देखिये! वे क्या कर रहे हैं? नौकरशाह- उन्हें देखो वह करोड़ों का मालिक बन बैठा है, नेता, उसके पास कई पुश्तों को खिलाने लायक संपत्ति.. व्यापारी,उद्योगपति उसकी तिजोरियां कभी खाली होती ही नहीं। गुण्डागर्दी, चोरी,सीनाजोरी, आंतक और समय के प्रति गंभीरता का खात्मा जैसी बुराइयों ने संपूर्ण व्यवस्था को अपनी लपेट में ले लिया है। अभी दो रोज पहलेंं ही खबर आई कि राजनीतिक दलों की तिजोरियां इस समय पैसे से लबालब हैं। इसमें नम्बर एक पर केन्द्र में सरकार चला रही पार्टी -कांग्रेस है, जिसके खज़ाने में सर्वाधिक राशि जमा है। जबकि दूसरे नम्बर पर बहुजन समाज पाटीै। और पार्टियों भी पैसे एकत्रित कर अपना खजाना भरने में पीछे नहीं हैं। राजनीति का दूसरा अर्थ पैसा कमाना और अपने व अपने परिवार को इस लायक बनाना है कि कहीं किसी को कोई तकलीफ़ न हो। जब राजनीति के ये मायने हो गए तो स्वाभाविक है उसमें लिप्त लोग भी सिर्फ एक ही मकसद को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। मसलन अपना व अपने परिवार को समृद्व बनाओं, देश व जनता, जिसकी सेवा की कसम खाकर सुनहरे कल की ओर पहुंचे हैं वह गई चूल्हें मेंं- किसी को इसकी चिंता नहीं कि देश की जनता किन- किन परिस्थितियों में अपने व अपने परिवार का पेट पाल रही है। देश की जनता इतनी बेबस व मजबूर हो गई है कि नेता के कहने पर उठता है, और नेता के कहने पर उसके चरणों में लोट जाता है, और इससे भी दिल नहीं भरा तो उसके गुणगान में जिंदा बाद के नारे लगाता हुआ अपना घर बर्बाद कर डालता है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था का किस प्रकार माखौल उड़ रहा है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं-सारा काम उसकी आंखों के सामने हो रहा है। आज भी आपने बहुत कुछ आपने- अपने टीवी स्क्रीन पर देखा होगा। जनता को चुनाव के बाद पांच साल के लिये बांध दिया जाता है। उसके मतों की सजा उसे इतनी मिलेगी, इसकी कल्पना भी उसने नहीं की होगी। हम अपने प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कोस कर सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि हमने जो रास्ता इस व्यवस्था को चलाने के लिये कायम किया वह सही नहीं है। हमें चाहिये थी एक ऐसी प्रजातांत्रिक प्रणाली जो जनता की आयाज़ बनकर संसद और विधानसभा के गलियारों में गूँजे। हम आज जिन्हें अपना नेता चुन रहे हैं, उसे हम अपना नेता नहीं बल्कि एक समूह का नेता ही कह पा रहे हैं। क्योंकि हमारे बहुमत का एक हिस्सा तो उसे इस पद के लायक ही नहीं मानता। इसके लिये जरूरी है प्रजातंत्र की ही एक दूसरी प्रणाली जो अमरीका के प्रत्यक्ष चुनाव की तरह हो जिसमें नेता का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से भारी बहुमत से हो वह चाहे देश का राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री अथवा राज्य का मुख्यमंत्री सभी का चयन सीधे- सीधे उसकी लोकप्रियता, उसकी ईमानदारी, देशप्रेम पर आधिारित हो, न कि किसी एक समूह की पसंद पर। इस निर्वाचित व्यक्ति या उसके द्वारा मनोनीत व्यक्ति के पास इतने अधिकार हों कि वह देश की काया पलट दें। अब जब सारी बुराइयां वर्तमान प्रजातांत्रिक प्रणाली में मौजूद हैं। तब यह जरूरी है कि एक नई व्यवस्था जन्म ल,े ताकि सारी उन बुराइयों का खात्मा हो जो आज पूरे तंत्र में घर कर गई है। हम पूछना चाहते हैं कि इस वर्तमान व्यवस्था में हो क्या रहा है? नगर निकाय से लेकर विधानसभा और संसद तक सर्वत्र जो मर्जी में आता है वह किया जा रहा है। सबको किसी न किसी तरह से पैसा चाहिये। अगर नहीं मिलता तो वेतन -भत्ता बढ़वा लों, कोटा बढ़वा लो या कहीं ठेके में करोड़ों रूपये की लूट की खुली छूट दे दो।