सरासर गुण्डागर्दी..राजधानी में

सरासर गुण्डागर्दी..राजधानी में
पुलिस-प्रशासन है, कहां ?
जो कुछ रविवार को रायपुर में हुआ वह क्या था? आनर किलिंग का दूसरा रूप? या आपराधिक राजनीति का बढ़ता दायरा? जो कुछ कल हुआ उसमें कई निर्दाेष बच्चों को सिर्फ दोस्ती गांठने की सजा के तौर पर मार पीटकर अधमरा कर छोड़ दिया गया। समाज में उनकी इज्जत तो नीलाम कर दी, उनके परिवारों को भी नहीं बक्शा। संविधान में दिये गये व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन कुछ इस ढंंग से हुआ कि इसमें पुलिस खामोश व दर्शक बनी रही। धर्म और संस्कृति के नाम पर मुटठ़ी भर लोगों को कुछ भी कर लेने की स्वतंत्रता? राजधानी रायपुर-जहां राज्यपाल, मुख्यमंत्री,मुख्यसचिव, पुलिस महानिदेशक जैसी हस्तियां रहती हंै और कुछ ही दूरी पर न्यायधानी है। इन सबकी नाक के नीचे कुछ लोगों ने कई घरों के बच्चे -बच्चियों को न केवल जलील किया बल्कि उनके साथ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत गंभीर अपराध भी किया। लड़कों को मारा - पीटा गया, लड़कियों को छेड़ा गया। उनके मुंह पर कालिख पोती गई और भी जो कुछ करना था सब किया और यह सब हुआ पुलिस की देखरेख में। पुलिस मजा लेती रही क्योंकि उनके किसी अधिकारी का बेटा या बेटी इसमें उनको दिखाई नहीं दिये। इस पूरे मामले में गुण्डागर्दी करने वालों ने जिनको भी पीटा या कलिख लगाई उनके बारे में यह तक पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि उनका आपस में रिश्ता क्या है? पुलिस कतिपय मामलों में जो उसकी आंखों के सामने घटित होती है। उसपर उसी समय कार्रवाई करती है जब कोई उसके पास रिपोर्ट लिखाने पहुंचे...यह है अंधा कानून...जो न केवल अंधा है, बल्कि अब अशक्त और बहरा भी हो गया है। हमारे नेता, मंत्री और पुलिस के सारे बड़े अधिकारी उस समय सो रहे थे। जब इस शहर में यह नंगा नाच चल रहा था। क्या किसी से दोस्ती गांठना हमारी संस्कृति नहीं? अगर ऐसा है तो सब सही वरना जिसने भी ऐसा किया है उसे सख्त से सख्त सजा उसी प्रकार की दी जानी चाहिये जिसमें राह चलते किसी को छेडऩे या रेप करने पर दी जाती है। मदर्स डे, फादर्स डे, वेलेन्टाइन डे, फ्रेण्डशिप डे इन सबका आगमन अभी कुछ ही सालों के अंदर भारत हुआ है। विदेश से आई नई टेकनीक और खानपान को तो हम अख्तियार कर लेते हैं लेकिन संस्कृति और धर्म का तो कुछ लोगों ने ठेका ले रखा है। उसे अपनाने का अधिकार किसी को नहीं? क्यों ? कौन है ये ठेकेदार? इन्हें कौन संरक्षण दे रहा है? क्या यह रोक पायेंगे संस्कृति के बहाव को ? रविवार को जिस ढंग से योजनाबद्व ढंग से युवक- युवतियों को निशाना बनाया गया। उसके पीछे असल में है कौन? हम सबने देखा कि जिन लोगों पर संस्कृति के नाम पर हमला...नहीं शायद कातिलाना हमला किया गया वे लोग युवा थे और जिनने हमला किया वे भी युवा थे। कौन भड़का रहा है, इन्हें? जो समय स्कूल- कॉलेज में पढऩे- लिखने का है। उसमें धर्म और संस्कृति कहां से घुस गई? क्या वे लोग जिन पर धर्म और संस्कृति की रक्षा के नाम पर हमला किया गया वे विदेश से आये थे? और क्या आज आप इन चार लड़कों पर कालिख पोत दोगे और उन्हें लात- घूसों से मार दोगे, तो वे अगली बार फ्रेण्डशिप या अन्य कोई डे नहीं मनायेंगे। जिस देश में सभी संस्कृति,धर्म को ग्रहण करने की आजादी है, उसे चंद लोग यूं कब तक रोकने का षडय़ंत्र करेंगें। बीता कल रविवार था लोगों को सप्ताह में एक दिन की छ़ुट्टी मिलती है। इसमें कुछ लोगों ने एनजॉय किया तो कुछ लोग एनजॉय करने वालों के दुश्मन बन गये। पुलिस व प्रशासन दोनों ने इस मामले में गुण्डागर्दी करने की खुली छूट दे दी और मानवअधिकार और महिलाओं के हमदर्द बनने वाले बयान देकर खामोश हो गये। क्या हमारी व्यक्तिगत आजादी भी अब किसी के रहमोकरम पर हो गई है? हम यह भी सवाल करना चाहते हैं कि जिनके माताा- पिता को इन सब बातों पर अपत्ति नहीं है तो उन्हें रोकने व उन्हें सुधारने वाले बाहरी तत्व कौन हैं?

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