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कौन कर रहा है हमारी स्वतंत्रता का हनन?

रायपुर, बुधवार, दिनांक 11 अगस्त 2010

राजा महाराजाओं की तरह एक वर्ग
का क़ब्ज़ा है हमारी स्वतंत्रता पर !
उनके घरों में आपकी जेब से निकलने वाले पैसे से झाड़ू लगता है, उनके यहां का हर काम ठाठ- बाट से चलता है, यहां तक कि उनके बच्चों को गेाद में उठाकर खिलाने के लिये भी हमारे ही लोग लगे रहते हैं। और तो और जब उनकी सवारी लाल- पीली बत्ती लगकर सड़कों पर से निकलती हैं, तब हमें किसी कोने में खड़े रहना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे राजा महाराजाओं के जमाने में उनकी सवारी निकला करती थी- अब से मात्र चार दिनों बाद हम भारत के स्वतंत्रता की त्रेसठवीं साल गिरह मनाने जा रहे हैं लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम वाक़ई स्वतंत्र हैं? क्या हमें देश के अपने लोगों ने ही गुलामी के बंधन में नहीं जकड़ रखा है? क्या हम यह महसूस नहीं करते कि देश में हमारे से भी बड़ा एक बहुत प्रभावशाली वर्ग विकसित हो गया हैं। जो न केवल हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रहा है बल्कि हमारे और हमारे बच्चों की ख़ुशियों को भी छीन रहा है? नौकरशाहों और राजनेताओं के इस वर्ग ने समाज को दो वर्गाे में बांटकर रख दिया है। सारे एशो- आराम का तो जैसे उन्होंने ही ठेका ले रखा है। घर से लेकर अ।फिस और सड़क तक यह वर्ग आम आदमी को कुछ समझता ही नहीं। पैसे और प्रभाव के गरूर ने इस वर्ग को अपने मूल मकसद जनता की सेवा से दूर कर दिया है। उसे वह कीड़े -मकोड़ा समझने लगा है। जब उनकी सवारी निकले तो हम रास्ते में उसी प्रकार सिर झुकाए घंटों खड़े रहें जैसा राजा- महाराजाओं के समय होता रहता था। कई तो अपना पाँव भी छुआते हैं और देखते हैं कि कौन पांव नहीं छू रहा ताकि बाद में उसका पत्ता काटा जाये। इन्फोसिस के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति बहुत बड़े आदमी हैं। उनकी छवि एक आदर्शवादी है। उन्होंने जनता की इस भावना को महसूस किया है। उनका कहना है कि राजनेता और नेता आज भी औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहे हैं। वे खुद को जनता का मालिक समझते हैं। इसलिये वे मानते है कि सरकारी काम में न पारदर्शिता की जरूरत है और न ही निष्पक्षता बरतने की। मूर्ति की उन बातों से क्या जनता सहमत नहीं है जिसमें उन्होंने कहा है कि राजनेताओं की मानसिकता पुरानी पड़ गई है और जनता भी उनकी इस मानसिकता से बराबर उदासीन है। एक हजार साल से सत्ता उन लोगों के हाथ में हैं जो जनता की पहुंच से हजारों मील दूर बैठे रहते हैं-भ्रष्टाचार के लिये पेनाल्टी बहुत कम है, किसी को डर नहीं है। इसलिये कोई जवाबदेही भी नहीं हैं। सरकारी क्षेत्र पूरी तरह भ्रष्टाचार और पतन की ओर है क्योंकि वह जनता से दूर हो गया। इस संबंध में इससे बड़ा उदाहरण और क्या दें कि जब हमारे स्कूल के छात्रों ने एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खराब प्रदर्शन किया तो एक वरिष्ठ अफ़सर का जवाब था कि भारत को ऐसी प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लेना चाहिये। हमे अपने प्रदर्शन को सुधरवाने की कोशिश करने की जगह हमें हतोत्साहित करने का काम भी यह नौकरशाह कर रहे हैं।

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