सोमवार, 9 अगस्त 2010

मज़दूर क्यों हैं मजबूर?

रायपुर सोमवार।
दिनांक 9 अगस्त 2010

मज़दूर क्यों हैं मजबूर?
राज्य बनने के बाद भी छत्तीसगढ़ के मज़दूर बाहर दूसरे प्रांतों में जाकर काम करने के लिये क्यों मजबूर हैं? वे कौन लोग हैं जो मज़दूरों को बहकाकर दूसरे प्रांतों में ले जाते हैं और बंधक बनाकर उनसे काम कराते हैं। सरकार की ढेर सारी योजनाओं के बाद भी ऐसी परिस्थितियां क्यों निर्मित हो रही है? इन सब सवालों का शायद यही जवाब है कि यहां मिलने वाली मजदूरी से कई गुना ज्यादा मजदूरी का लालच इन मज़दूरों को दिया जाता है जिसके चलते वे यहां से पलायन कर जाते हैं। लेह में बादल फटने के बाद आई बाढ के ताण्डव में छत्तीसगढ़ के आठ श्रमिकों की मौत ने सरकार की श्रमिकों के हित में शुरू की गई सारी योजनाओं की पोल खोलकर रख दी है। हमेशा यह कहा जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ से जो पलायन होता है वह गर्मी के दिनों में होता है, जब मजदूरों को काम मिलना मुश्किल होता है। इस दौरान वे दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करने के बाद बारिश शुरू होते ही अपने गांव वापस आ जाते हैं। इस प्रक्रिया को मान सकते हैं कि उनका निर्णय इस मामले में सही है कि गर्मी में कहीं कुछ काम कर दो पैसे कमा कर घर आ जाये और जो खेत खलिहान हैं उसमें कुछ पैदा कर अपना व अपने बच्चों का भरण पोषण करें। बारिश में बड़े खेतिहर किसानों के यहां मज़दूरों को काम मिल जाता है। किसी मजदूर के सामने इस समय रोजी रोटी की समस्या पैदा नहीं होती। कुछ ही ऐसे होते हैं जिनके समक्ष यह समस्या बनती है। अकेले जांजगीर जिले से कम से कम दो सौ श्रमिकों के भारत-पाक सीमावर्ती क्षेत्र में काम के लिये जाना और यह भी इस बरसात के मौसम में यही बताता है कि उन्हें कोई बरगलाकर या भरपूर लालच देकर ले गया और वहां ले जाकर बंधक बनाकर रखा। लेह बादल फटने और बाढ़ आने के हादसे में आठ लोगों के मरने की पुष्टि उनके परिवार के लोग कर रहे हैं जबकि इतने ही श्रमिकों की हालत गंभीर है। करीब एक सौ सत्रह श्रमिकों के फंसे होने की जानकारी मिली है। अधिकांश श्रमिकों को काम दिलाने के नाम पर ठेकेदारों के दलाल यहां से लेकर गये थे। प्रशासन के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि जांजगीर से कितने श्रमिक लेह या देश के विभिन्न भागों में गये हैं। शायद छत्तीसगढ़ में प्रशासन के लोग ऐसा कोई आंकड़ा रखते भी नहीं। यह तो श्रमिक और उनके आश्रित परिवारों का मामला है अब इस हादसे से सरकारी व्यवस्था की पोल खुलने के बाद यह प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ है कि मज़दूरों की तरह कितनी ही लड़कियों को भी यहां से बरगलाकर एजेंटों ने महानगरों में बेचा होगा। बहरहाल मामला सतह पर आने के बाद अब सरकार को चाहिये कि वह इस मामले की गंभीरता से जांच करें ताकि सारी स्थिति स्पष्ट हो।