बुधवार, 4 अगस्त 2010

छात्र संघ चुनाव!

रायपुर ,बुधवार, दिनांक 4 अगस्त 2010
छात्र संघ चुनाव!
महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव हो या न हो? इसपर बहस छिड़ी हुई है। एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को इस मांग को लेकर विधानसभा घेरने की कोशिश की जिसमें वे असफल रहे। छत्तीसगढ़भर से आये उग्र छात्रों को खदेडऩे के लिये पुलिस ने पानी की बौछारों का प्रयोग किया तो लाठी भी भांजी और गिरफतारी भी की। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद जोगी का छात्रों के इस आंदोलन का समर्थन था। राजनीतिक नजरिये से इस आंदोलन को देखा जाये तो अजीत जोगी ने एक बार फिर यह दर्शा दिया कि युवा शक्ति उनके साथ है वहीं इस आंदोलन ने सरकार को कुछ हद तक यह सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव हो या न हो। सरकार इस मामले में क्या निर्णय लेगी यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन छात्रों की इस मांग को प्रजातांत्रिक दृष्टि से समर्थन किया जाना चाहिये लेकिन इसमें जो खामिया है जिसके चलते छात्र संघ चुनाव बंद किया गया उसे दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिये। पहली बात तो चुनाव की स्थिति में कालेजों में भारी गुटबाजी, मारपीट की स्थिति पैदा होती है। कुछ प्रत्याशियों को बंधक बनाकर उनके साथ जो सलूक होता है वह भी असहनीय है। छात्र संघ की राजनीति से ऊ पर उठे एक दर्जन से ज्यादा छात्र आज सत्ता की ऊं ची, ऊची कुर्सियों पर विराजमान हैं जिनमें बृजमोहन अग्रवाल का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। इनके अलावा सत्ता से जुड़े विधायक देवजी पटेल, आदि का नाम भी इस कड़ी में जोड़ा जा सकता है जबकि विपक्ष से मोहम्मद अकबर,रवीन्द्र चैबे जैसे लोग भी छात्र राजनीति और उस दौरान होने वाले चुनाव में विजयी होकर आज जनता केबीच साख कायम किये हुए हैं। वे छात्र राजनीति को आज के छात्रों से अच्ठी तरह जानते हैं और उनका इसका अनुभव भी है ऐसे में अगर यही लोग बैठकर छात्रों के हित में कोई फैसला ले तो यह ज्यादा उचित रहेगा। जहां तक छात्र संघ चुनाव का मामला है हम यह पहले ही कह चुके हैं कि यह गुटबाजी और तनाव में मददगार होगी वहीं अगर छात्रों को उनके प्राप्त अंकों के आधार पर कालेज में चुनाव होते हैं तो यह बहुत कम छात्रों को पसंद आयेगा क्योंकि ज्यादातर चुनाव की मांग करने वाले छात्रो को चुनाव से कोई फायदा नहीं मिलने वाला। अब तक के वर्षाे में चुनाव नहीं होने का ही परिणाम है कि कैम्पस ज्यादा चर्चा में नहीं हैं चूंकि अधिकांश छात्रों का ध्यान चुनाव जैसे कार्यक्रमों से हटकर पढ़ाई लिखाई की तरफ रहता है अतरू अब सरकार चुनाव कराने का जोखिम लेगी ऐसा नहीं लगाता।